बंगाल चुनाव की वोटर लिस्ट से ड्यूटी कर रहे अफसरों का नाम गायब, SC ने अपील पर सुनवाई से किया इनकार

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीधे राहत देने से इनकार कर दिया है. प्रभावित लोगों को ट्रिब्यूनल जाने को कहा गया है, जिससे चुनाव के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है.

Shraddha Mishra

पश्चिम बंगाल चुनाव के बीच एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है, जिसने चुनावी प्रक्रिया पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुंची याचिका पर अदालत ने सुनवाई से इनकार कर दिया है. खास बात यह है कि इस मामले में वे लोग भी शामिल हैं, जो खुद चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोलीने इस याचिका पर सुनवाई की और सीधे राहत देने से मना कर दिया.

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील एमआर शमशाद ने अदालत में दलील दी कि कई लोगों के नाम बिना किसी स्पष्ट कारण के मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं. उन्होंने बताया कि करीब 65 ऐसे अधिकारी हैं जो चुनाव ड्यूटी पर तैनात हैं, लेकिन उनके नाम ही मतदाता सूची से गायब कर दिए गए हैं. शमशाद ने कहा कि इन अधिकारियों के ड्यूटी आदेशों में उनके मतदाता पहचान पत्र (EPIC) नंबर दर्ज हैं, फिर भी सूची से उनके नाम हटाए जाना बेहद चिंताजनक है. उनका कहना था कि यह स्थिति ऐसी है, जहां चुनाव कराने वाले लोग खुद मतदान नहीं कर पा रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को वैकल्पिक रास्ता अपनाने की सलाह दी. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस तरह के मामलों के लिए विशेष रूप से अपीलीय न्यायाधिकरण बनाए गए हैं और याचिकाकर्ताओं को वहीं जाकर अपनी शिकायत रखनी चाहिए.

क्या इस चुनाव में वोट दे पाएंगे प्रभावित लोग?

सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि जिन लोगों की अपील अभी लंबित है, वे इस बार के विधानसभा चुनाव में शायद मतदान नहीं कर पाएंगे. हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि अपील की प्रक्रिया जारी रखने से भविष्य में उनके नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़े जा सकते हैं. न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि मतदाता सूची में नाम बने रहना एक महत्वपूर्ण अधिकार है, और इसे सुरक्षित रखना जरूरी है, भले ही इस बार मतदान का मौका न मिल पाए.

विवाद की जड़ क्या है?

यह पूरा मामला ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसके तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं. इस प्रक्रिया को लेकर देशभर में कई सवाल उठ रहे हैं और कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.

पश्चिम बंगाल में अलग व्यवस्था

पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया को लेकर पहले से ही विवाद रहा है. भारत निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार के बीच भरोसे की कमी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला लिया था. 20 फरवरी को अदालत ने निर्देश दिया था कि SIR प्रक्रिया की जिम्मेदारी राज्य सरकार से हटाकर न्यायिक अधिकारियों को सौंपी जाए.

बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए

इस काम के लिए करीब 900 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था. 16 अप्रैल तक इन अधिकारियों ने लगभग 60 लाख आपत्तियों पर फैसला सुनाया, जिसके बाद करीब 27 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. इन फैसलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए 19 अपीलीय न्यायाधिकरण बनाए गए हैं. हालांकि, अब तक केवल 136 मामलों में ही अंतिम निर्णय हो पाया है, जबकि लाखों अपीलें लंबित हैं.

कोर्ट की चिंता और सुझाव

सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि अपीलों के निपटारे की गति बहुत धीमी है. इस पर कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ने पर कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क किया जा सकता है, ताकि प्रक्रिया तेज हो सके. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जाए, क्योंकि यह मतदाताओं के अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय है.

रिकॉर्ड मतदान पर संतोष

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले चरण में हुए रिकॉर्ड मतदान पर खुशी जताई. भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, पहले चरण में करीब 91.78 प्रतिशत मतदान हुआ, जो अब तक का सबसे अधिक है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का मतदान करना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है.

अदालत ने यह भी संतोष जताया कि मतदान के दौरान किसी बड़े हिंसक घटना की खबर नहीं आई. सरकार और वकीलों ने भी इसे शांतिपूर्ण और सफल चुनाव बताया. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव दो चरणों में हो रहे हैं. पहला चरण पूरा हो चुका है, जबकि दूसरा चरण 29 अप्रैल को होगा. चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे.

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