'37 मौत, सैकड़ों घायल, लेकिन...'मालेगांव बम धमाके के चारों आरोपी बॉम्बे हाई कोर्ट से बरी
साल 2006 में महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए सीरियल बम धमाकों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने चारों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. कोर्ट का कहना है कि इनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है.

महाराष्ट्र: महाराष्ट्र के मालेगांव में साल 2006 में हुए सीरियल बम धमाकों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने चारों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. कोर्ट ने लोकेश शर्मा, धन सिंह, राजेंद्र चौधरी और मनोहर नरवरिया को निर्दोष माना. इस घटना में मस्जिद के पास हुए धमाकों में 37 लोगों की जान चली गई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे.
NIA कोर्ट ने पहले भी किया था बरी
इससे पहले विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) अदालत ने भी इस मामले में कई आरोपियों को सबूतों की कमी के आधार पर बरी कर दिया था. 2008 के मालेगांव धमाके के मामले में सात आरोपियों को बरी किया गया था, जिनमें पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, अजय राहिरकर, सुधाकर धर द्विवेदी (शंकराचार्य के नाम से मशहूर) और समीर कुलकर्णी शामिल थे. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष पर्याप्त और ठोस सबूत नहीं पेश कर सका.
धमाका कब और कैसे हुआ?
यह दुखद घटना 8 सितंबर 2006 को हुई थी. नासिक जिले के मालेगांव में भिक्कू चौक के पास मस्जिद और कब्रिस्तान के नजदीक चार बम धमाके हुए. यह रमजान के पवित्र महीने के दौरान और हिंदू त्योहार नवरात्रि से ठीक पहले का समय था. धमाकों में 37 लोग मारे गए और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए. शहर की सांप्रदायिक संवेदनशीलता को देखते हुए इस घटना ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया था.
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 323 गवाह पेश किए, लेकिन कई गवाह अपने बयान से मुकर गए, जिससे मामला कमजोर पड़ गया. शुरुआत में महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने जांच की और आरोपियों को गिरफ्तार किया. बाद में 2011 में मामला NIA को सौंप दिया गया.
सबूतों की कमी का हवाला
कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिले. UAPA, शस्त्र अधिनियम और IPC के तहत लगाए गए सभी आरोप हटा दिए गए. इस फैसले के बाद अब इन आरोपियों पर कोई कानूनी दबाव नहीं रहा.
मालेगांव बम धमाके का मामला लंबे समय से चर्चा में रहा है. कई सालों की कानूनी प्रक्रिया के बाद हाई कोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हालांकि, पीड़ित परिवार अब भी न्याय की मांग कर सकते हैं.


