बंकिम दा नहीं, बंकिम बाबू बोलिए, TMC सांसद ने PM मोदी को टोका...आखिर बंगाली में 'दा' और 'बाबू' में क्या फर्क होता है
लोकसभा में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने गीत की ऐतिहासिक भूमिका और स्वतंत्रता संग्राम में उसके योगदान पर प्रकाश डाला. बंकिमचंद्र को “बंकिम दा” कहने पर सौगत रॉय ने आपत्ति जताई, जिसे प्रधानमंत्री ने सम्मानपूर्वक स्वीकार किया.

नई दिल्ली : वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर लोकसभा में सोमवार को एक महत्वपूर्ण चर्चा आयोजित की गई, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की. उन्होंने इस ऐतिहासिक गीत की भूमिका और स्वतंत्रता आंदोलन में इसके योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस युग का ऐसा प्रेरणा-स्रोत था जिसने भारतीयों को उपनिवेशवाद के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने की शक्ति दी. प्रधानमंत्री ने इस चर्चा को राष्ट्र के गौरव का क्षण बताते हुए कहा कि इस विषय पर सामूहिक रूप से विचार करना हर भारतीय के लिए सौभाग्य का विषय है.
“बंकिम बाबू” कहना अधिक उपयुक्त होगा
गौरवगाथा को दोबारा स्थापित करने का अवसर
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि वंदे मातरम की 150 वर्षों की यात्रा अनेक चुनौतीपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरी है. उन्होंने बताया कि जब इसके 50 वर्ष पूरे हुए, तब देश औपनिवेशिक शासन की बेड़ियों में बंधा था. बाद में जब 100 वर्ष पूरे हुए, तब भारत आपातकाल की कठोर परिस्थितियों में जकड़ा हुआ था, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबा दिया गया था और देशभक्तों को जेलों में कैद किया जा रहा था. प्रधानमंत्री ने इसे इतिहास का एक काला दौर बताते हुए कहा कि आज 150 वर्ष पूरे होने पर वंदे मातरम की गौरवगाथा को दोबारा स्थापित करने का अवसर मिला है.
आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश
प्रधानमंत्री ने कहा कि इस विशेष चर्चा से न केवल सदन की प्रतिबद्धता प्रकट होती है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण सीख बन सकती है. उनके अनुसार, वंदे मातरम उस ऊर्जा, त्याग और संकल्प का प्रतीक है जिसने 1947 में भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आज जब देश अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है, तब इस गीत की प्रेरणा राष्ट्र को आगे बढ़ाने की शक्ति देती है.


