झारखंड में हिरासत में मौतों पर हाईकोर्ट की सख्ती, सरकार से मांगी जवाबदेही

झारखंड में हिरासत में हुई मौतों के मामलों को लेकर राज्य की हेमंत सोरेन सरकार को झारखण्ड होई कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

रांची: झारखंड में हिरासत में हुई मौतों के मामलों को लेकर राज्य की हेमंत सोरेन सरकार को झारखण्ड होई कोर्ट की कड़ी नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है. अदालत ने इन मामलों में जांच प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि राज्य सरकार ने कानूनी प्रावधानों का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया है. कोर्ट ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि उपलब्ध आंकड़े न्याय व्यवस्था के प्रति लापरवाही और गैर-अनुपालन की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं.

2018 से 2025 के बीच राज्य में हिरासत में कितनी मौतें हुईं? 

एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पेश आंकड़ों से पता चला कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच राज्य में हिरासत में कुल 427 मौतें दर्ज की गईं. इनमें से 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेटों द्वारा कराई गई, जबकि कानून के अनुसार ऐसी जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा होना अनिवार्य है. इस पर न्यायमूर्ति एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्थिति कानून की मूल भावना की अनदेखी को दर्शाती है.

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार का यह दावा कि सभी मामलों की विधिसम्मत जांच हुई है, उसके अपने ही आंकड़ों से खंडित हो जाता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि दो दशक पहले ही ऐसे मामलों की जांच का अधिकार कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका को सौंप दिया गया था. इसके बावजूद बड़ी संख्या में मामलों की जांच गलत प्रक्रिया के तहत कराई गई, जो प्रशासनिक लापरवाही का स्पष्ट संकेत है.

कोर्ट ने राज्य सरकार को लगाई फटकार

कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि हिरासत में मौत जैसे संवेदनशील मामलों में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए संसद ने विशेष प्रक्रिया तय की है, लेकिन झारखंड सरकार उसका पालन करने में विफल रही. अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड रखने और मामलों के प्रबंधन में गंभीर खामियां दिखाई देती हैं.

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने गृह, कारागार एवं आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव और संबंधित जिला न्यायाधीशों को छह महीने के भीतर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. साथ ही, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई पर भी जवाब मांगा गया है.

इसके अलावा अदालत ने राज्य सरकार को 2018 से अब तक कार्यकारी मजिस्ट्रेटों द्वारा जांचे गए सभी मामलों की जिलावार सूची दो महीने में प्रस्तुत करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने पीड़ित परिवारों को राहत देने के लिए जिला पीड़ित मुआवजा समितियों को स्वतः संज्ञान लेकर मुआवजे पर विचार करने का भी निर्देश दिया है, ताकि प्रभावित परिवारों को लंबी कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े.

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