Explainer: भारत को आदेश देने निकले ट्रंप, पर भूल गए कि यह संप्रभु राष्ट्र है, व्हाइट हाउस का रिमोट कंट्रोल नहीं

अमेरिकी राष्ट्रपति फिर फरमान सुना रहे हैं कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा, मानो दिल्ली उनका दफ्तर हो। भारत की चुप्पी इस दावे को संदिग्ध बनाती है, क्योंकि यहां विदेश नीति ट्वीट से नहीं, संप्रभु फैसलों से चलती है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

ट्रंप का रिकॉर्ड देखें तो यह साफ दिखता है कि वह अक्सर बोल पहले देते हैं, सच्चाई बाद में तलाशते हैं। भारत के मामले में भी यही हो रहा है। बिना किसी आधिकारिक भारतीय बयान के यह दावा करना कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा, यह न सिर्फ जल्दबाजी है बल्कि भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाने जैसा है। भारत कोई उपनिवेश नहीं है। भारत कोई दबाव में फैसले लेने वाला देश नहीं है। भारत की विदेश नीति व्हाइट हाउस की प्रेस ब्रीफिंग से तय नहीं होती। भारत अपने फैसले संसद और रणनीतिक जरूरतों के आधार पर करता है। ट्रंप शायद भूल गए हैं कि भारत किसी के इशारे पर चलने वाला देश नहीं है। यह बयान अमेरिका की बेचैनी दिखाता है, भारत की कमजोरी नहीं।

क्या यह वही ट्रंप नहीं हैं जिन्होंने झूठे श्रेय लिए थे?

याद कीजिए जब भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम हुआ था। उस वक्त भी ट्रंप ने दुनिया के सामने ढिंढोरा पीटा था कि उन्होंने यह जंग रुकवाई है। भारत सरकार ने उस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। न समर्थन। न धन्यवाद। क्योंकि भारत जानता था कि यह दावा झूठा है। यह प्रचार है। यह आत्मप्रशंसा है। ट्रंप को हर घटना में खुद को नायक दिखाने की आदत है। भारत ने तब भी चुप्पी रखी थी। वही चुप्पी अब भी जारी है। फर्क बस इतना है कि ट्रंप का झूठ अब दुनिया पहचान चुकी है।

क्या ट्रंप को झूठ बोलने की आदत पड़ चुकी है?

ट्रंप का इतिहास यही बताता है। कभी कहते हैं कि भारत टैरिफ से डर जाएगा। कभी कहते हैं कि पाकिस्तान से दोस्ती भारत को झुका देगी। कभी कहते हैं कि भारत उनकी बात मानेगा। लेकिन हर बार भारत ने चुप रहकर जवाब दिया है। और यही बात ट्रंप को सबसे ज्यादा चुभती है। क्योंकि ट्रंप को कैमरा चाहिए। बयान चाहिए। प्रतिक्रिया चाहिए। भारत उन्हें यह सुख नहीं देता। भारत जानता है कि हर शोर का जवाब देना जरूरी नहीं। ट्रंप का झूठ खुद उनके लिए बोझ बन जाता है।

क्या टैरिफ की धमकी से भारत झुका था?

ट्रंप ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए थे। मकसद साफ था। भारत पर दबाव बनाना। उसे आर्थिक चोट देकर राजनीतिक झुकाव पैदा करना। लेकिन क्या हुआ? भारत ने न तो बयानबाजी की। न झुका। न सौदेबाजी की भीख मांगी। उल्टा रूस के साथ रिश्ते और मजबूत हुए। भारत ने साफ संकेत दिया कि वह अपने हित खुद तय करेगा। ट्रंप की टैरिफ नीति भारत को नहीं डरा सकी। बल्कि अमेरिका की मंशा उजागर हो गई।

क्या रूस भारत का मजबूर साथी है या रणनीतिक दोस्त?

रूस भारत का मजबूर विकल्प नहीं है। रूस भारत का रणनीतिक साझेदार है। दशकों पुराना। रक्षा। ऊर्जा। तकनीक। हर क्षेत्र में। जब पश्चिमी देश रूस से दूरी बना रहे थे, तब भारत ने खुले तौर पर कहा कि वह अपने हित देखेगा। सस्ता तेल भारत की जरूरत है। महंगाई से जूझती जनता की जरूरत है। और यह फैसला किसी दबाव में नहीं बदला जाएगा। भारत भावनाओं से नहीं, आंकड़ों से चलता है। ट्रंप इस व्यावहारिक सोच को समझ नहीं पा रहे।

क्या अमेरिका को भारत की जरूरत नहीं है?

यह सवाल ट्रंप खुद से क्यों नहीं पूछते। अमेरिका को भारत चाहिए। बाजार के रूप में। रणनीतिक साझेदार के रूप में। चीन के मुकाबले में। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में। अमेरिका यह जानता है कि भारत को नाराज करना उसके हित में नहीं है। फिर भी ट्रंप ऐसी भाषा बोलते हैं जैसे भारत कोई छोटा खिलाड़ी हो। सच्चाई यह है कि अमेरिका की रणनीति भारत के बिना अधूरी है। यही बेचैनी बार-बार बयानों में दिखती है।

क्या पाकिस्तान कार्ड फिर से खेला गया?

जब टैरिफ से बात नहीं बनी तो पाकिस्तान कार्ड खेला गया। पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाई गई। संकेत दिए गए कि अमेरिका के पास विकल्प हैं। लेकिन भारत ने तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। क्योंकि भारत जानता है कि पाकिस्तान अमेरिका की मजबूरी है। भारत नहीं। पाकिस्तान को अमेरिका इस्तेमाल करता है। भारत साझेदारी करता है। यही फर्क ट्रंप बार-बार भूल जाते हैं। यही भूल अमेरिका की रणनीति को कमजोर बनाती है।

क्या निगरानी की धमकी सिर्फ डराने के लिए है?

अब अमेरिका कह रहा है कि वह निगरानी करेगा। अगर भारत रूस से तेल खरीदता रहा तो कार्रवाई पर विचार करेगा। सवाल यह है कि कौन सी कार्रवाई। कैसे कार्रवाई। किस कानून के तहत कार्रवाई। यह बयान नीति नहीं है। यह धमकी है। और भारत धमकियों से नहीं चलता। भारत ने पहले भी ऐसी भाषा सुनी है। और हर बार नजरअंदाज किया है। ट्रंप की धमकी कागज़ी शेर से ज्यादा कुछ नहीं।

क्या भारत की चुप्पी कमजोरी है?

नहीं। भारत की चुप्पी कमजोरी नहीं है। यह रणनीति है। भारत जानता है कि हर बयान का जवाब बयान से देना जरूरी नहीं। कभी-कभी चुप रहकर सामने वाले को बेनकाब किया जाता है। और ट्रंप खुद अपने बयानों से बेनकाब हो रहे हैं। भारत का संयम उसकी ताकत है। ट्रंप इसे कमजोरी समझ रहे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी गलती है।

क्या मोदी ट्रंप के आगे झुकेंगे?

यह सवाल बार-बार उठाया जा रहा है। लेकिन पिछले अनुभव साफ कहते हैं कि मोदी सरकार दबाव में फैसले नहीं बदलती। न टैरिफ से। न धमकी से। न झूठे दावों से। रूस से तेल खरीदना भारत की आर्थिक जरूरत है। और यह फैसला किसी व्हाइट हाउस के बयान से नहीं बदलेगा। मोदी ने पहले भी संकेत दिए हैं। भारत साझेदारी करता है। गुलामी नहीं।

क्या यह भारत की परीक्षा लेने की कोशिश है?

संभव है। अमेरिका देखना चाहता हो कि भारत कितनी दूर तक जाता है। कितना दबाव झेलता है। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका यह परीक्षा खुद के लिए भी बना रहा है। क्योंकि अगर वह भारत को खोता है, तो उसे चीन के सामने अकेले खड़ा होना पड़ेगा। यह जोखिम अमेरिका खुद नहीं उठा सकता। यही वजह है कि सारी धमकियां सिर्फ बयान तक सीमित रहती हैं।

क्या ट्रंप भूल गए हैं कि भारत 2026 का भारत है?

यह 1990 का भारत नहीं है। यह आत्मनिर्भर भारत है। यह अपनी शर्तों पर दोस्ती करने वाला भारत है। यह अपनी जरूरतों पर फैसले लेने वाला भारत है। और यही बात ट्रंप के दावों को खोखला बनाती है। भारत अब वैश्विक ताकत है। ट्रंप पुराने चश्मे से भारत को देख रहे हैं। और यही उनकी रणनीतिक भूल है।

क्या दुनिया ट्रंप के दावों पर भरोसा करती है?

आज की दुनिया ट्रंप के बयानों को नमक की तरह लेती है। थोड़ा सा। क्योंकि इतिहास गवाह है कि उनके दावे अक्सर हवा होते हैं। भारत को लेकर भी यही हो रहा है। दावा बड़ा है। सबूत शून्य है। दुनिया अब शब्द नहीं देखती। फैसले देखती है। और फैसलों में भारत मजबूती से खड़ा है।

क्या भारत को अब खुलकर बोलना चाहिए?

यह फैसला भारत का है। लेकिन अब तक की रणनीति यही रही है कि भारत बोलता कम है। करता ज्यादा है। और यही वजह है कि ट्रंप जैसे नेता बार-बार बयान देकर भी खाली हाथ रह जाते हैं। भारत जानता है कि सही वक्त पर जवाब देना ही असली ताकत है। अभी वक्त भारत के साथ है।

ट्रंप बोलते रहेंगे, भारत करता रहेगा

ट्रंप दावे करते रहेंगे। धमकियां देते रहेंगे। निगरानी की बात करते रहेंगे। लेकिन भारत अपने हित में फैसले करता रहेगा। रूस से तेल खरीदेगा या नहीं। यह फैसला दिल्ली में होगा। वॉशिंगटन में नहीं। और यही बात शायद ट्रंप को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। क्योंकि भारत अब किसी के दबाव में चलने वाला देश नहीं रहा।

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