गलवान तनाव के बाद चीन पर न्यूक्लियर टेस्ट का आरोप, अमेरिका ने बढ़ाया दबाव
गलवान घाटी में भारत-चीन तनाव के बाद अब अमेरिका ने चीन पर साल 2020 में गुप्त परमाणु परीक्षण करने का आरोप लगाया है. इस मुद्दे पर अमेरिका-चीन टकराव तेज हो गया है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन पर नए परमाणु समझौते को लेकर दबाव बनाते नजर आ रहे हैं.

नई दिल्ली: भारत-चीन के गलवान घाटी में हुए तनाव के बाद अब एक और बड़ा अंतरराष्ट्रीय विवाद सामने आ गया है. अमेरिका ने चीन पर साल 2020 में गुपचुप तरीके से परमाणु परीक्षण करने का गंभीर आरोप लगाया है. वॉशिंगटन का दावा है कि बीजिंग ने इस परीक्षण को दुनिया से छिपाने की कोशिश की, जिससे वैश्विक परमाणु निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं.
यह आरोप ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका और रूस के बीच आखिरी बची परमाणु हथियार नियंत्रण संधि भी खत्म हो चुकी है. इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन पर दबाव बनाते नजर आ रहे हैं और नए परमाणु समझौते की वकालत कर रहे हैं.
22 जून 2020 को किया गया न्यूक्लियर टेस्ट
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि चीन ने 22 जून 2020 को कम तीव्रता वाला परमाणु परीक्षण किया था. यह परीक्षण भारत और चीन के बीच मई 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के लगभग एक महीने बाद हुआ था.
अमेरिका के हथियार नियंत्रण मामलों के शीर्ष अधिकारी थॉमस डिनैनो ने वियना में आयोजित एक वैश्विक निरस्त्रीकरण सम्मेलन के दौरान दावा किया कि चीन ने सैकड़ों टन विस्फोटक क्षमता वाले परमाणु परीक्षण की तैयारी की और उसे अंजाम भी दिया.
'अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के उल्लंघन की जानकारी थी'
डिनैनो के अनुसार, चीन की सेना को यह भली-भांति पता था कि इस तरह का परीक्षण अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन होगा. इसी वजह से चीन ने इसे छिपाने की कोशिश की.
अमेरिका का आरोप है कि चीन ने एक विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया, जिससे परमाणु विस्फोट के झटके जमीन के भीतर कम महसूस हों और वैश्विक निगरानी प्रणालियों को धोखा दिया जा सके.
परमाणु निगरानी एजेंसी ने क्या कहा
दुनिया भर में परमाणु परीक्षणों पर नजर रखने वाली संस्था कॉम्प्रिहेन्सिव न्यूक्लियर-टेस्ट-बैन ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (CTBTO) ने कहा है कि उसके सिस्टम को 22 जून 2020 को किसी भी परमाणु विस्फोट का संकेत नहीं मिला.
संस्था के मुताबिक, उसका इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम आमतौर पर 500 टन या उससे अधिक क्षमता वाले विस्फोट को पकड़ सकता है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विस्फोट बेहद कम तीव्रता का हो, तो उसे छिपाया जा सकता है. यही कारण है कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के दावों में अंतर दिखाई दे रहा है.
चीन ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
चीन ने अमेरिका के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के राजदूत शेन जियान ने कहा कि बीजिंग परमाणु परीक्षण रोकने की अपनी नीति पर कायम है.
उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका झूठी कहानियां गढ़कर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहा है. चीन का कहना है कि वह परमाणु हथियारों के मामले में केवल आत्मरक्षा की नीति अपनाता है और किसी तरह की गुप्त गतिविधि में शामिल नहीं है.
अब क्यों उठा अमेरिका ने यह मुद्दा
इस विवाद की टाइमिंग बेहद अहम मानी जा रही है. ठीक एक दिन पहले ही अमेरिका और रूस के बीच न्यू स्टार्ट संधि खत्म हो गई है. यह समझौता दोनों देशों के परमाणु हथियारों की संख्या पर कानूनी सीमा तय करता था.
इसके समाप्त होने के बाद पहली बार दशकों में दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों पर कोई कानूनी रोक नहीं बची है.
ट्रंप क्यों बना रहे हैं चीन पर दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वह पुराने परमाणु समझौतों से बंधे नहीं रहना चाहते. उनका कहना है कि अब एक नया परमाणु समझौता होना चाहिए, जिसमें रूस के साथ-साथ चीन भी शामिल हो.
अमेरिका का दावा है कि चीन का परमाणु जखीरा तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में यह एक हजार से अधिक वारहेड्स तक पहुंच सकता है.
डील से क्यों बच रहा है चीन
चीन का तर्क है कि उसका परमाणु भंडार अमेरिका और रूस की तुलना में काफी छोटा है. ऐसे में उस पर समान जिम्मेदारी डालना उचित नहीं है. इसी वजह से बीजिंग किसी नए त्रिपक्षीय परमाणु समझौते में शामिल होने से फिलहाल बचता नजर आ रहा है.


