फिर झुके शहबाज-मुनीर! अफगानिस्तान से भारी नुकसान के बाद दिया शांति प्रस्ताव, काबुल भेजा डेलीगेशन

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच 13 दिनों से जारी संघर्ष में भारी नुकसान के बाद पाकिस्तान ने तालिबान से बैक-चैनल बातचीत शुरू की है. काबुल भेजे गए प्रतिनिधिमंडल ने शांति प्रस्ताव दिया, लेकिन तालिबान ने युद्धविराम के लिए सख्त शर्त रखी है.

Shraddha Mishra

काबुल: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चल रहे संघर्ष ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. करीब दो हफ्तों से जारी झड़पों में भारी नुकसान उठाने के बाद पाकिस्तान अब शांति की कोशिशों में जुटा दिखाई दे रहा है. रिपोर्टों के अनुसार, 13 दिनों तक चले इस संघर्ष में पाकिस्तान को बड़ा सैन्य नुकसान हुआ है. इसी के बाद पाकिस्तान ने अफगान तालिबान के साथ बैक-चैनल बातचीत शुरू करने का फैसला किया और एक विशेष प्रतिनिधिमंडल काबुल भेजा है.

बताया जा रहा है कि यह प्रतिनिधिमंडल मंगलवार, 10 मार्च 2026 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंचा. इस तीन सदस्यीय दल का नेतृत्व मौलाना फजल-उर-रहमान खलील कर रहे हैं, जिन्हें आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिद्दीन का संस्थापक माना जाता है.

युद्ध में पाकिस्तान को बड़ा नुकसान

सूत्रों के मुताबिक, पिछले 13 दिनों के संघर्ष में पाकिस्तानी सेना को काफी नुकसान झेलना पड़ा है. रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इस दौरान पाकिस्तान के 337 सैनिकों की मौत हो गई. इसके अलावा 184 सैन्य चौकियां और सात बड़े सैन्य अड्डे भी नष्ट हो गए. इस नुकसान के बाद पाकिस्तान ने स्थिति को शांत करने के लिए कूटनीतिक रास्ता अपनाने की कोशिश शुरू की है. इसी उद्देश्य से तालिबान सरकार के साथ सीधे संपर्क की बजाय बैक-चैनल वार्ता की पहल की गई है.

तीन सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल काबुल पहुंचा

काबुल भेजे गए प्रतिनिधिमंडल में तीन लोग शामिल हैं. इसके प्रमुख मौलाना फजल-उर-रहमान खलील हैं, जिन्हें जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर का गुरु भी बताया जाता है. वह जैश-ए-मोहम्मद के शूरा का सदस्य भी माने जाते हैं. 

दल के दूसरे सदस्य अब्दुल्लाह सईद शाह हैं, जिन्हें पीर मजहर सईद शाह के नाम से भी जाना जाता है. उन्हें जैश-ए-मोहम्मद का कमांडर बताया जाता है और वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) की राजनीति से भी जुड़े हुए हैं. 

तीसरे सदस्य मौलाना सज्जाद उस्मान हैं, जो हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के संस्थापक सदस्यों में गिने जाते हैं. साथ ही उन्हें जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े वित्तीय मामलों को संभालने वाला प्रमुख व्यक्ति माना जाता है.

तालिबान सरकार को दिया शांति का प्रस्ताव

जानकारी के अनुसार, इस प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार शाम करीब चार बजे काबुल में तालिबान सरकार के अधिकारियों से मुलाकात की. इस बैठक में पाकिस्तान की ओर से संघर्ष को समाप्त करने और शांति बहाल करने का प्रस्ताव रखा गया. हालांकि, बातचीत के दौरान तालिबान सरकार ने साफ कर दिया कि संघर्षविराम के लिए पाकिस्तान को कुछ शर्तें माननी होंगी.

युद्धविराम के लिए तालिबान की शर्त

तालिबान सरकार का कहना है कि जब तक पाकिस्तान लिखित रूप में यह आश्वासन नहीं देता कि वह भविष्य में अफगानिस्तान पर हमला नहीं करेगा, तब तक संघर्षविराम संभव नहीं है. बताया जा रहा है कि इस संघर्ष को खत्म करने के लिए पाकिस्तान पहले भी कई देशों से मध्यस्थता की अपील कर चुका है. पाकिस्तान ने कतर, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की से बातचीत कर उनसे मदद मांगी थी, लेकिन अफगानिस्तान की ओर से सख्त रुख अपनाया गया.

पहले भी आतंकी संगठनों की मदद ले चुका है पाकिस्तान

सूत्रों का मानना है कि इस प्रतिनिधिमंडल को भेजने का फैसला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की रणनीति का हिस्सा हो सकता है. इससे पहले भी पाकिस्तान अफगान तालिबान के साथ संपर्क बनाने के लिए जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर की मदद ले चुका है. बताया जाता है कि इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल तीनों लोग अफगान जिहाद के समय से ही तालिबान से जुड़े रहे हैं. उस दौर में उन्होंने सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया था.

इसी पुराने संबंधों को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान अब इन व्यक्तियों के जरिए तालिबान के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. माना जा रहा है कि पाकिस्तान सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी इन रिश्तों का इस्तेमाल कर अफगानिस्तान के साथ किसी तरह युद्धविराम का रास्ता निकालना चाहती है.

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